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        <title><![CDATA[ Igrain India ]]></title>
        <link><![CDATA[ https://igrain.in/feeds ]]></link>
        <description><![CDATA[ Igrain India ]]></description>
        <language>en</language>
        <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 16:20:52 +0530</pubDate>
  
                    <item>
                <title><![CDATA[अमरीकी सोयाबीन के उत्पादन एवं निर्यात में वृद्धि होने का अनुमान]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">शिकागो। अमरीका में इस वर्ष सोयाबीन क्षेत्र का परिदृश्य बेहतर, मजबूत और सकारात्मक प्रतीत हो रहा है। 2026-27 के वर्तमान मार्केटिंग सीजन के दौरान अमरीकी सोयाबीन के उत्पादन एवं निर्यात में बढ़ोत्तरी होने तथा बकाया अधिशेष स्टॉक में कमी आने का अनुमान है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">चालू सीजन के दौरान अमरीका में सोयाबीन का उत्पादन 160 लाख बुशेल की बढ़ोत्तरी के साथ 4.50 अरब बुशेल पर पहुंचने की उम्मीद है क्योंकि इस बार इसकी औसत उपज दर सुधरकर 52.8 बुशेल प्रति एकड़ पर पहुंचने के आसार हैं। फसल कटाई का दायरा भी इस बार बढ़ेगा। अमरीका में सोयाबीन की नई फसल की कटाई-तैयारी लगभग आरंभ हो गई है।&nbsp;</span></p><p>अमरीकी कृषि विभाग (उस्डा) ने 2026-27 सीजन के लिए सोयाबीन के निर्यात का अनुमान 250 लाख बुशेल बढ़ाकर अब 1.69 अरब बुशेल नियत किया है जबकि अंतिम बकाया स्टॉक का अनुमान 100 लाख बुशेल घटाकर 31 करोड़ बुशेल निर्धारित किया है। सम्पूर्ण मार्केटिंग सीजन में सोयाबीन का औसत मूल्य 12 डॉलर प्रति बुशेल रहने की संभावना व्यक्त की गई है। इसी तरह सोयामील का औसत मूल्य 340 डॉलर प्रति शॉर्ट टन रहने का अनुमान लगाया गया है। </p><p>इस महत्वपूर्ण तिलहन का वैश्विक उत्पादन 44.23 करोड़ टन पर पहुंचने की संभावना व्यक्त की गई है। जबकि इसका बकाया स्टॉक घटकर 12.40 करोड़ टन रह सकता है। ब्राजील के बाद अमरीका दुनिया में सोयाबीन का दूसरा सबसे प्रमुख उत्पादक एवं निर्यातक देश है। उसे इस बार चीन में अपने स्टॉक का निर्यात बढ़ने का भरोसा है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37541</guid>				
                <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 16:12:44 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[आयातक देशों की मजबूत मांग से भारतीय चावल का भाव ऊंचा]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। अमरीका और ईरान के बीच तनाव में कोई कमी आने का संकेत नहीं मिलने से विभिन्न देशों को अपनी खाद्य सुरक्षा की चिंता सताने लगी है। खाड़ी क्षेत्र के देश चावल की खरीद में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं।&nbsp;</span></p><p>वैश्विक स्तर पर भारतीय चावल की मांग मजबूत होने से कीमतों में तेजी का माहौल देखा जा रहा है। पिछले साल की तुलना में चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2026) के दौरान बासमती चावल के दाम में 15-20 प्रतिशत तथा सामान्य या गैर बासमती चावल के मूल्य में 20-25 प्रतिशत का भारी इजाफा दर्ज किया गया। दक्षिण भारत में वर्षा एवं क्षेत्रफल में कमी के कारण धान के उत्पादन में गिरावट आने की संभावना है। दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में भी अल नीनो के प्रभाव से धान-चावल का उत्पादन घटने की आशंका व्यक्त की जा रही है।&nbsp;</p><p>अक्टूबर-नवम्बर में धान के नए माल की आवक शुरू होने तक चावल का भाव ऊंचा तथा मजबूत रहने की उम्मीद है। वैश्विक बाजार में भी विभिन्न किस्मों एवं श्रेणियों के चावल का भाव हाल के सप्ताहों में तेज हुआ है। एक अग्रणी व्यापार विश्लेषक के अनुसार आयातक देश अपनी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जोरदार प्रयास कर रहे हैं। </p><p>इसके तहत खासकर चावल और गेहूं की खरीद आक्रामक ढंग से की जा रही है। पश्चिम-एशिया, मध्य पूर्व एवं खाड़ी क्षेत्र के देश भारत से विशाल मात्रा में चावल खरीद रहे हैं। बासमती चावल का औसत बाजार भाव अप्रैल-जून&nbsp; 2025 में 85 रुपए प्रति किलो था जो अप्रैल-जून 2026 में बढ़कर 100 रुपए प्रति किलो के आसपास पहुंच गया। बासमती चावल का निर्यात&nbsp; प्रदर्शन सामान्य रहा।&nbsp;</p><p>गैर बासमती चावल की कीमत भी तेज हुई है। सोना मसूरी चावल का दाम 51-52 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 63-64 रुपए प्रति किलो हो गया है। पुराने चावल का स्टॉक कम बचा है जबकि नए चावल की आपूर्ति शुरू होने में कुछ देर है। निर्यात मोर्चे का परिदृश्य बेहतर बना हुआ है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37535</guid>				
                <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 15:42:22 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[दक्षिणी एवं पूर्वी भारत में वर्षा का अभाव बरकरार]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। अब दक्षिण-पश्चिम मानसून के वापस लौटने का समय आ गया है लेकिन अभी तक दीर्घकालीन औसत के मुकाबले राष्ट्रीय स्तर पर वर्षा की कमी 15 प्रतिशत पर बरकरार है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">इसके तहत खासकर दक्षिण भारत के प्रायद्वीपीय क्षेत्र तथा पूर्वी एवं पूर्वोत्तर राज्यों में वर्षा की भारी कमी देखी जा रही है। दक्षिण भारत में 28 प्रतिशत एवं पूर्वी राज्यों में 25 प्रतिशत कम बारिश हुई है। इसके अलावा पश्चिमोत्तर राज्यों एवं मध्यवर्ती भारत में भी वर्षा की कमी क्रमश: 10 प्रतिशत एवं 6 प्रतिशत दर्ज की गई।&nbsp;</span></p><p>संभागीय स्तर पर वर्षा की कमी कम दिखाई पड़ती है जबकि क्षेत्रीय एवं प्रांतीय स्तर पर यह ज्यादा बड़ी है। अल नीनो मौसम चक्र का असर मानसून की दशा एवं दिशा पर साफ परिलक्षित हो रहा है। दक्षिण भारत के चारों प्रमुख कृषि उत्पादक राज्यों- तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं आंध्र प्रदेश में वर्षा की भारी कमी महसूस की जा रही है। </p><p>उड़ीसा में भी वर्षा का अभाव बना हुआ था मगर पिछले सप्ताह राज्य के कई भागों में अच्छी बारिश हो गई। झारखंड भी काफी हद तक सूखे की चपेट में है। बिहार, बंगाल एवं आसाम में सामान्य से कम वर्षा होने की सूचना मिल रही है। मानसून की वापसी यात्रा के दौरान कुछ राज्यों में भारी वर्षा होने की उम्मीद है। महाराष्ट्र और गुजरात के कुछ जिलों में भी वर्षा की आवश्यकता है अन्यथा खरीफ फसलों को नुकसान हो सकता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37533</guid>				
                <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 15:38:44 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[निकट भविष्य में खाद्य महंगाई का ग्राफ ऊंचा रहने की संभावना]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीसीआई) पर आधारित खाद्य महंगाई की दर अगस्त 2026 में बढ़कर 5.95 प्रतिशत पर पहुंच गई जिसका प्रमुख कारण अदरक, लहसुन, प्याज, चीनी एवं खाद्य तेलों का महंगा होना रहा।&nbsp;</span></p><p>अगस्त में जुलाई के मुकाबले उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक में 0.92 प्रतिशत का इजाफा हुआ। ध्यान देने की बात है कि जून की तुलना में जुलाई के दौरान सूचकांक में इससे भी अधिक बढ़ोत्तरी हुई थी और यह 5.52 प्रतिशत पर पहुंचा था। वर्ष 2025 में जून से दिसम्बर तक खाद्य मूल्य सूचकांक ऋणात्मक जोन में रहा था अब अनेक वस्तुओं के दाम घट गए थे।&nbsp;</p><p>उल्लेखनीय है कि जनवरी 2026 में जब सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय द्वारा नए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की श्रृंखला आरंभ की गई थी और 2024 को इसका आधार वर्ष माना गया था तब खाद्य महंगाई दर केवल 2.13 प्रतिशत&nbsp; आंकी गई थी। इससे पूर्व जो सूचकांक प्रचलित था उसमें 2012 को आधार वर्ष माना गया था। यदि इन दोनों आधार वर्ष का आंकलन किया जाए तो अगस्त 2026 में खाद्य मूल्य सूचकांक में पिछले 19 महीनों में सबसे ऊंचा ग्राफ नजर आता है। यह स्थिति भारतीय रिजर्व बैंक की चिंता बढ़ाने वाली है।&nbsp;</p><p>आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में अदरक का दाम 73.82 प्रतिशत, प्याज का 48.27 प्रतिशत, लहसुन का 43.60 प्रतिशत, चीनी का 24.2 प्रतिशत तथा सरसों तेल का दाम 6.92 प्रतिशत ऊंचा रहा। अगस्त 2025 की तुलना में अगस्त 2026 के दौरान खाद्य तेलों का खुदरा मूल्य 8.8 प्रतिशत ऊंचा हो गया। जुलाई के मुकाबले अगस्त में चावल क दाम में हुई वृद्धि 3.3 प्रतिशत से बढ़कर 5.88 प्रतिशत पर पहुंच गई।&nbsp;</p><p>सितम्बर से नवम्बर तक त्यौहारी सीजन रहता है जिसमें विभिन्न खाद्य उत्पादों एवं मसालों की मांग बढ़ जाती है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि इस तिमाही में खाद्य महंगाई का ग्राफ ऊंचे स्तर पर बरकरार रह सकता है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37531</guid>				
                <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 13:44:57 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[कर्नाटक में गुड़ इकाइयों को एथनॉल उत्पादन की अनुमति देने की मांग]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">मैसूर। दक्षिण भारत के सबसे प्रमुख गन्ना एवं चीनी उत्पादक राज्य- कर्नाटक में इस बार गुड़ निर्माण इकाइयों को एथनॉल के उत्पादन की अनुमति देने की मांग की जा रही है। गन्ना उत्पादकों का कहना है कि चीनी का भाव ऊंचा होने से सरकार&nbsp; इसके उत्पादन पर विशेष जोर देगी और इसलिए चीनी मिलों को एथनॉल उत्पादन के लिए गन्ना अवयवों के इस्तेमाल की अनुमति मिलने में संदेह है। पेट्रोल में मिश्रण के लिए एथनॉल का उत्पादन जरुरी है। ऐसी हालत में अगर गुड़ निर्माण इकाइयों को एथनॉल उत्पादन की स्वीकृति दी जाये तो चीनी का उत्पादन प्रभावित नहीं होगा।&nbsp;</span></p><p>आगामी समय में पर्व-त्यौहारों की एक लम्बी श्रृंखला शुरू होने वाली है जिससे चीनी की मांग, खपत एवं कीमत बढ़ सकती है। चीनी की बेहतर आपूर्ति एवं उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए इसका उत्पादन एवं स्टॉक बढ़ाना जरुरी है। ऐसी स्थिति में गुड़ एवं अनाज से एथनॉल का उत्पादन बढ़ाना उपयोगी होगा। कर्नाटक गुड़ का एक अग्रणी उत्पादक राज्य है।&nbsp;</p><p>कर्नाटक राज्य गन्ना उत्पादक संघ के अध्यक्ष का कहना है कि एथनॉल उत्पादन से होने वाला वित्तीय लाभ केवल बड़ी-बड़ी चीनी मिलों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। स्थानीय गुड़ निर्माताओं को इसके उत्पादन की तकनीक देते हुए एथनॉल निर्माण की अनुमति प्रदान की जानी चाहिए। </p><p>अध्यक्ष के अनुसार गुड़ इकाइयों में निर्मित एथनॉल का उपयोग घरों में एक कूकिंग ईंधन के रूप में और साथ ही साथ किसानों को अपने वाहनों तथा ट्रैक्टर आदि चलाने में करने की स्वीकृति दी जानी चाहिए। इससे गन्ना उत्पादकों को फायदा होगा।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37529</guid>				
                <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 13:01:11 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[दक्षिण भारत के चारों उत्पादक राज्यों में धान का क्षेत्रफल घटा]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा का पर्याप्त सहारा नहीं मिलने से चालू खरीफ सीजन के दौरान सबसे प्रमुख खाद्यान्न- धान के उत्पादन क्षेत्र में भारी गिरावट आ गई। इसके तहत खासकर दक्षिण भारत में रकबा काफी घट गया। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं झारखंड में भी धान का क्षेत्रफल गत वर्ष से पीछे रह गया। धान की खेती की प्रक्रिया लगभग समाप्त हो चुकी है।&nbsp;</span></p><p>केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि मौजूदा खरीफ सीजन में 11 सितम्बर 2026 तक धान का कुल उत्पादन क्षेत्र 426.81 लाख हेक्टेयर पर पहुंच सका जो पिछले साल की समान अवधि के रकबा 443.78 लाख हेक्टेयर से करीब 4 प्रतिशत या 16.97 लाख हेक्टेयर कम मगर सामान्य (पंचवर्षीय) औसत क्षेत्रफल 405.36 लाख हेक्टेयर से काफी अधिक है। पिछले साल धान का उत्पादन क्षेत्र तेजी से बढ़कर सर्वकालीन सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया था।&nbsp;</p><p>आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार गत वर्ष के मुकाबले वर्तमान खरीफ सीजन के दौरान धान के उत्पादन क्षेत्र में कर्नाटक&nbsp; में 4.54 लाख हेक्टेयर, तेलंगाना में 4.46 लाख हेक्टेयर, आंध्र प्रदेश में 1.90 लाख हेक्टेयर, उत्तर प्रदेश में 1.84 लाख हेक्टेयर, मध्य प्रदेश में 1.75 लाख हेक्टेयर, तमिलनाडु में 1.40 लाख हेक्टेयर, महाराष्ट्र में 1.15 लाख हेक्टेयर तथा झारखंड में 97 हजार हेक्टेयर की गिरावट आ गई। </p><p>कुछ राज्यों में धान का रकबा बढ़ा भी है जबकि अन्य प्रांतों में उत्पादन क्षेत्र में सीमित कमी-वृद्धि हुई है। धान संभवतः ऐसा अकेला कृषि उत्पाद है जिसकी खेती देश के सभी राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में होती है। अगले महीने (अक्टूबर) से इसकी नई फसल की कटाई-तैयारी आरंभ हो जाएगी।</p><p>क्षेत्रफल में गिरावट आने तथा मानसून की वर्षा कम होने से इस बार धान का उत्पादन घटने की संभावना है जिसे देखते हुए सरकार ने केन्द्रीय पूल के लिए इसकी खरीद के लक्ष्य में थोड़ी कटौती कर दी है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37527</guid>				
                <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 12:24:12 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[अमरीका में मटर फसल की कटाई लगभग पूरी]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">डलास। संयुक्त राज्य अमरीका (यूएसए) में मटर फसल की कटाई-तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है जबकि कनाडा में अभी जारी है। अमरीकी कृषि विभाग (उस्डा) के नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि प्रमुख उत्पादक राज्यों में मौसम की हालत सामान्य रहने से किसानों को फसल की कटाई में ज्यादा कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा।&nbsp;</span></p><p>उस्डा की रिपोर्ट के अनुसार अमरीका में 99 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र में मटर की फसल काटी जा चुकी है जबकि पिछले साल के इसी अवधि में 94 प्रतिशत फसल की कटाई हुई थी। मटर फसल की कटाई का पंचवर्षीय औसत आंकड़ा भी 94 प्रतिशत ही है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि इस बार कटाई-तैयारी की गति तेज रही।</p><p>मटर के दो शीर्ष उत्पादक राज्यों- मोंटाना एवं उत्तरी डकोटा में फसल पूरी कट चुकी है। फसल की कटाई तो इडाहो, ऑरेगॉन तथा वाशिंगटन जैसे उत्पादक राज्यों में भी समाप्त हो जाने का अनुमान है लेकिन उस्डा कार्यालय को इन प्रांतों में फसल कटाई का प्रतिशत आंकड़ा अभी प्राप्त नहीं हुआ है। अमरीका के पड़ोसी देश- कनाडा में मौसम पूरी तरह अनुकूल नहीं है इसलिए मटर फसल की कटाई में बाधा पड़ रही है। सस्कैचवान एवं अल्बर्टा प्रान्त में अक्सर बारिश से कटाई रुक जाती है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37525</guid>				
                <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 11:39:30 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[19 सितम्बर से शुरू हो सकती है मानसून के वापस लौटने की प्रक्रिया]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/19-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। पश्चिमोत्तर भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून की तीव्रता एवं गतिशीलता (पकड़) में कमी आना शुरू हो गया है और अगले चार-पांच दिन में यह इस क्षेत्र से प्रस्थान कर सकता है। मौसम विभाग का कहना है कि पश्चिमी राजस्थान से मानसून के वापस लौटने के लिए परिस्थितियां अनुकूल होने लगी है और 19 सितम्बर के आसपास इसकी वापसी की प्रक्रिया आरंभ हो जाने की संभावना है। मानसून की वापसी की तिथि आमतौर पर 17 सितम्बर मानी जाती है।&nbsp;</span></p><p>लेकिन यह वापसी पूरी तरह सूखी नहीं होगी बल्कि मानसून के लौटते चरण के दौरान बारिश हो सकती है। दरअसल दक्षिण-पूर्वी राजस्थान एवं इससे सटे उत्तरी गुजरात के ऊपर एक वर्षा वाहक कम दाब का क्षेत्र बना हुआ है जो वातावरण में नमी की भरपूर मात्रा बरकरार रखने में सक्षम है। इसके फलस्वरूप उस क्षेत्र में जोरदार बारिश हो सकती है। इससे खरीफ फसलों को काफी राहत मिलेगी।&nbsp;</p><p>मौसम विभाग के मुताबिक पिछले दिन हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली एवं पश्चिमी मध्य प्रदेश में कहीं सामान्य तो कहीं अत्यन्त भारी बारिश हुई। मानसून की वापसी के मार्ग में ये सारे क्षेत्र भी आते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर सामान्य औसत की तुलना में मानसूनी वर्षा की कमी बढ़कर 15 प्रतिशत पर पहुंच गई है। दक्षिण भारत में यह कमी ज्यादा देखी जा रही है जहां कहीं-कहीं 28 प्रतिशत तक कम बारिश हुई है। मानसून की विदाई के क्रम में देश के कई भागों में अच्छी वर्षा होने की उम्मीद की जा रही है।&nbsp; &nbsp;</p><p>पश्चिमी राजस्थान से निकलकर मानसून मध्यवर्ती भारत होते हुए दक्षिणी प्रायद्वीप में पहुंचेगा इसलिए रास्ते में कई जगह भारी वर्षा होने के आसार बने हुए हैं। दीर्घकालीन औसत के मुकाबले खासकर दक्षिणी प्रायद्वीप एवं पूर्वी तथा पूर्वोत्तर राज्यों में वर्षा बहुत कम हुई है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37522</guid>				
                <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 11:02:45 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[चीनी के औसत खुदरा मूल्य में धीरे-धीरे आ रही है नरमी]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/---]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। अखिल भारतीय स्तर पर चीनी का औसत खुदरा मूल्य लगातार चौथे दिन 14 सितम्बर को 60 रुपए प्रति किलो से नीचे रहा। सरकार द्वारा उठाए गए अनेक कदमों के कारण चीनी के एक्स फैक्टरी मूल्य एवं थोक बाजार भाव में पहले ही शीर्ष स्तर के मुकाबले भारी गिरावट आ चुकी है जबकि अब खुदरा बाजार भाव भी नरम पड़ने लगा है। वैसे जोरदार त्यौहारी मांग के कारण कीमतों में भारी तेजी नहीं आ रही है और कुछ क्षेत्रों में दाम ऊंचे स्तर पर ही मौजूद है।&nbsp;</span></p><p>उपभोक्ता मामले विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि 14 सितम्बर से चीनी का औसत खुदरा मूल्य 59.57 रुपए प्रति किलो रहा जो 13 सितम्बर के मूल्य 58.99 रुपए प्रति किलो से कुछ ऊंचा मगर 60 रुपए प्रति किलो से नीचे था। 11 सितम्बर को भाव 60 रुपए प्रति किलो पर था। पिछले तीन दिनों से इसमें नरमी का रुख बना हुआ था।&nbsp;</p><p>उल्लेखनीय है कि 21 अगस्त को चीनी का खुदरा मूल्य उस समय घटकर 58.23 रुपए प्रति किलो पर आ गया था जब सरकार ने पहली बार चीनी निर्यात की अनुमति दी थी और कुछ अन्य उपायों की घोषणा की थी। लेकिन उसके बाद यह 60 रुपए प्रति किलो से ऊपर हो गया। 14 सितम्बर को चीनी का उच्चतम खुदरा मूल्य 85 रुपए प्रति किलो तथा न्यूनतम खुदरा मूल्य 40 रुपए प्रति किलो दर्ज किया गया। दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में चीनी का भाव कुछ ऊंचा हो गया जबकि तमिलनाडु एवं केरल में थोड़ा नीचे आ गया।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37520</guid>				
                <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 10:26:12 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[एक अरब टन से ऊपर पहुंच सकती है गेहूं की वैश्विक उपलब्धता]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">शिकागो। अमरीकी कृषि विभाग (उस्डा) ने 2026-27 के मार्केटिंग सीजन के दौरान गेहूं की दैनिक आपूर्ति एवं उपलब्धता बढ़कर 1.10 अरब टन पर पहुंचने की संभावना व्यक्त की है जो पिछले माह के अनुमान से 35 लाख टन ज्यादा है। इस आंकड़े में उत्पादन के साथ पिछला बकाया स्टॉक भी शामिल है। उस्डा की नई मासिक रिपोर्ट में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा एवं यूक्रेन जैसे निर्यातक देशों में गेहूं के उत्पादन का अनुमान बढ़ाया गया है।&nbsp;</span></p><p>उस्डा की रिपोर्ट में गेहूं की वैश्विक खपत का अनुमान भी 5 लाख टन बढ़ाकर 82.68 करोड़ टन निर्धारित किया गया है लेकिन दूसरी ओर इसके वैश्विक कारोबार का अनुमान 9 लाख टन घटाकर 21.18 करोड़ टन नियत किया गया है। </p><p>हालांकि उस्डा ने 2026-27 के सीजन में विश्व स्तर पर खाद्य, बीज एवं औद्योगिक उद्देश्य में गेहूं का उपयोग घटने की संभावना व्यक्त की है मगर पशु आहार (सीड) एवं अवशिष्ट उपयोग में इसकी खपत बढ़ने की उम्मीद जताई है।&nbsp;</p><p>गेहूं के वैश्विक व्यापार के अनुमान में कटौती इसलिए की गई है क्योंकि रूस एवं यूक्रेन से काला सागर जल मार्ग के लिए इस खाद्यान्न का शिपमेंट बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। दोनों देश एक-दूसरे के बंदरगाहों एवं व्यापारिक जहाजों पर भीषण बमबारी कर रहे हैं। </p><p>कोई नहीं जानता है कि यह संकट कब तक बरकरार रहेगा। उस्डा ने 2026-27 सीजन के अंत के लिए गेहूं का वैश्विक बकाया अधिशेष स्टॉक 27.63 करोड़ टन रहने की संभावना व्यक्त की है जो अगस्त में लगाए गए अनुमान से करीब 30 लाख टन ज्यादा है। रूस, ऑस्ट्रेलिया एवं यूक्रेन में इसका ऊंचा स्टॉक रहने की उम्मीद है क्योंकि वहां से इसके निर्यात का प्रदर्शन बेहतर रहने में संदेह है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37509</guid>				
                <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 19:11:34 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[बारिश की कमी से कुछ राज्यों में गन्ना की फसल प्रभावित]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्तर पर गन्ना की खेती तो पहले ही पूरी हो चुकी है लेकिन सही समय पर अच्छी वर्षा नहीं होने से फसल की प्रगति में बाधा पड़ रही है। इससे गन्ना की औसत उत्पादकता एवं चीनी की रिकवरी में कमी आ सकती है। महाराष्ट्र के कई भागों एवं कर्नाटक तथा तमिलनाडु के अधिकांश इलाकों में इस बार दक्षिण पश्चिम मानसून की बारिश कम हुई है। अन्य महत्वपूर्ण उत्पादक राज्यों में भी वर्षा का असमान वितरण देखा जा रहा है।&nbsp;</span></p><p>सरकारी आंकड़ों के अनुसार चालू वर्ष के दौरान गन्ना का घरेलू उत्पादन क्षेत्र 58.47 लाख हेक्टेयर पर पहुंच सका जो पिछले साल के क्षेत्रफल 58.87 लाख हेक्टेयर से 40 हजार हेक्टेयर कम है बिजाई की प्रक्रिया लगभग समाप्त होने के बाद भी चीनी के उत्पादन का कोई ठोस अनुमान लगाना संभव नहीं हो रहा है </p><p>क्योंकि नीनो एवं कमजोर मानसून से फसल को अब भी खतरा बना हुआ है। गन्ना फसल की एक मुश्त कटाई नहीं होती है बल्कि इसका सिलसिला अक्टूबर से आरंभ होकर अप्रैल तक चलता रहता है। फसल को नियमित अंतराल पर बारिश की जरूरत पड़ती है।&nbsp;</p><p>चीनी उत्पादन का परिदृश्य साफ नहीं हो रहा है। उद्योग संगठन दुविधा में है क्योंकि सरकार ने एथनॉल निर्माण में गन्ना अवयवों के उपयोग के बारे में अभी तक किसी निर्णय की घोषणा नहीं की है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37507</guid>				
                <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 19:08:13 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[तिलहन फसलों का वैश्विक उत्पादन 73.35 करोड़ टन के करीब होने का अनुमान]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-73-35-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">वाशिंगटन। अमरीकी कृषि विभाग (उस्डा) ने अपनी सितम्बर की रिपोर्ट में 2026-27 सीजन के दौरान तिलहन फसलों&nbsp; का सकल वैश्विक उत्पादन बढ़कर 72.346 करोड़ टन पर पहुंचने की संभावना व्यक्त की है जो अगस्त की रिपोर्ट में लगाए गए अनुमान 72.10 करोड़ टन से करीब 25 लाख टन ज्यादा है। इसका कारण मुख्यतः रेपसीड तथा सूरजमुखी के उत्पादन में इजाफा होना है।&nbsp;</span></p><p>रेपसीड के वैश्विक उत्पादन अनुमान में 19 लाख टन की बढ़ोतरी की गई है और खासकर ऑस्ट्रेलिया तथा रूस में उत्पादन का आंकड़ा बढ़ाया गया है। इसके अलावा कजाकिस्तान एवं उरुग्वे में भी इसके उत्पादन अनुमान में कुछ वृद्धि की गई है। इसी तरह सूरजमुखी का वैश्विक उत्पादन अनुमान 10 लाख टन बढ़ाया गया है। इसके तहत कजाकिस्तान, रूस एवं यूरोपीय संघ में उत्पादन बेहतर होने की संभावना व्यक्त की गई है।&nbsp;</p><p>उस्डा की रिपोर्ट में 2026-27 सीजन के लिए सोयाबीन के वैश्विक उत्पादन, निर्यात एवं क्रशिंग के अनुमान में बढ़ोत्तरी की गई है। लेकिन खपत में वृद्धि होने से बकाया स्टॉक का अनुमान घटा दिया गया है। सितम्बर की रिपोर्ट में सोयाबीन का वैश्विक उत्पादन 44.23 करोड़ टन होने की संभावना व्यक्त की गई है जो अगस्त के आंकड़े से 1 लाख टन ज्यादा है। इसके तहत अमरीका तथा कनाडा के उत्पादन अनुमान में वृद्धि तथा भारत एवं यूरोपीय संघ के उत्पादन अनुमान में कटौती की गई है।&nbsp;</p><p>उस्डा ने अगस्त की रिपोर्ट में 2026-27 सीजन के दौरान विश्व स्तर पर 19,041 करोड़ टन सोयाबीन का निर्यात होने का अनुमान लगाया था जिसे सितम्बर की रिपोर्ट में बढ़ाकर 19,158 करोड़ टन नियत किया है। इसके तहत अमरीका, कनाडा बेनिन एवं यूक्रेन से निर्यात का अनुमान बढ़ाया गया है। दूसरी ओर यूरोपीय संघ, भारत तथा जापान में इसके आयात के अनुमान में वृद्धि की गई है। मार्केटिंग सीजन के अंत में सोयाबीन का वैश्विक बकाया स्टॉक 12.40 करोड़ टन रहने की संभावना व्यक्त की गई है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37505</guid>				
                <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 18:00:13 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[धान के उत्पादन क्षेत्र में करीब 17 लाख हेक्टेयर की गिरावट]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-17-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। पिछले साल के मुकाबले इस वर्ष खरीफ फसलों के कुल उत्पादन क्षेत्र में 16.05 लाख हेक्टेयर की गिरावट आई है जबकि अकेले धान का रकबा इससे ज्यादा-लगभग 17 लाख हेक्टेयर घट गया है। अन्य फसलों के क्षेत्रफल में हुई कमी-वृद्धि से यह समीकरण बना है। धान की फसल को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है क्योंकि इसकी बिजाई कम और रोपाई ज्यादा होती है।</span></p><p>सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष खरीफ सीजन के सबसे प्रमुख खाद्यान्न- धान का उत्पादन क्षेत्र 11 सितम्बर तक 426.81 लाख हेक्टेयर पर पहुंच सका जो पिछले साल की समान अवधि के रकबा 443.78 लाख हेक्टेयर से 16.97 लाख हेक्टेयर कम रहा। दरअसल जून में मानसून की स्थिति बेहद कमजोर रहने से धान की रोपाई में भारी बाधा पड़ी थी और तभी से इसका रकबा गत वर्ष से पीछे चला आ रहा है। जुलाई-अगस्त की बारिश के सहारे इसके क्षेत्रफल में काफी सुधार आया मगर वह गत वर्ष से काफी पीछे रह गया।&nbsp;</p><p>2025-26 के खरीफ सीजन में धान का उत्पादन क्षेत्र तेजी से बढ़कर सर्वकालीन सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया था इसलिए चालू वर्ष का रकबा छोटा प्रतीत हो रहा है। यह रकबा पंचवर्षीय औसत क्षेत्रफल से काफी अधिक है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37503</guid>				
                <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 17:45:28 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[मौसम की हालत पर निर्भर करेगा तिलहन फसलों का उत्पादन]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। खरीफ कालीन तिलहन फसलों का बिजाई क्षेत्र गत वर्ष के अत्यन्त निकट पहुंच गया है और अब बिजाई की प्रक्रिया लगभग समाप्त हो गई है। कुछ महत्वपूर्ण उत्पादक प्रांतों में अच्छी बारिश होने से फसल की हालत संतोषजनक और कहीं-कहीं उत्साहवर्धक बनी हुई है लेकिन अन्य क्षेत्रों में मौसम एवं मानसून की स्थिति पूरी तरह अनुकूल नहीं होने से फसल का परिदृश्य कमजोर या सामान्य देखा जा रहा है।&nbsp;</span></p><p>केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार चालू खरीफ सीजन के दौरान देश में 11 सितम्बर तक तिलहन फसलों का कुल उत्पादन क्षेत्र 193.90 लाख हेक्टेयर पर पहुंचा जो पिछले साल के बिजाई क्षेत्र 194.07 लाख हेक्टेयर से महज 17 हजार हेक्टेयर कम है। आमतौर पर क्षेत्रफल में आई इस मामूली गिरावट का तिलहनों के सकल उत्पादन पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा लेकिन यदि मौसम एवं वर्षा की दशा में बिगाड़ आता है तो तिलहनों की पैदावार जरूर प्रभावित हो सकती है। अगले महीने से सोयाबीन एवं मूंगफली सहित अन्य तिलहनों के नए माल की जोरदार आवक शुरू हो सकती&nbsp; है।&nbsp;</p><p>आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पिछले साल की तुलना में चालू खरीफ सीजन के दौरान मूंगफली का उत्पादन क्षेत्र 50.66 लाख हेक्टेयर से गिरकर 50.45 लाख हेक्टेयर, सोयाबीन का बिजाई क्षेत्र 123.06 लाख हेक्टेयर से घटकर 122.08 लाख हेक्टेयर तथा अरंडी का क्षेत्रफल 9.31 लाख हेक्टेयर से गिरकर 8.36 लाख हेक्टेयर रह गया जबकि दूसरी ओर सूरजमुखी का उत्पादन क्षेत्र 67 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 1.29 लाख हेक्टेयर तथा तिल का बिजाई क्षेत्र 9.64 लाख हेक्टेयर से उछलकर 11.02 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया। इसके अलावा खरीफ सीजन में कुछ अन्य खरीफ फसलों की भी थोड़ी-बहुत खेती होती है।</p><p>मध्य प्रदेश एवं राजस्थान में तिलहन फसलों की हालत अच्छी बताई जा रही है मगर महाराष्ट्र, गुजरात एवं कर्नाटक में इसकी स्थिति मिश्रित बनी हुई है। दक्षिणी राज्यों में बारिश कम हुई है जिससे तेलंगाना, कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश में कहीं-कहीं फसलों के सूखने का खतरा पैदा हो गया है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37500</guid>				
                <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 17:18:05 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[अगस्त के अंत तक अनाज से निर्मित 6.24 अरब लीटर एथनॉल की आपूर्ति]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-6-24-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। ऑल इंडिया डिस्टीलर्स एसोसिएशन का कहना है कि 2025-26 के वर्तमान मार्केटिंग सीजन (नवम्बर-अक्टूबर) के दौरान तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) को अनाज से निर्मित 6.24 अरब लीटर एथनॉल की आपूर्ति की गई जो उसे हुई कुल आपूर्ति का लगभग 70 प्रतिशत है। उल्लेखनीय है कि नवम्बर 2025 से अगस्त 2026 के दौरान ओएमसी को कुल मिलाकर करीब 8.95 अरब लीटर एथनॉल की आपूर्ति हुई। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">डिस्टीलर्स द्वारा पूरे 2025-26 के मार्केटिंग सीजन के लिए 10.48 अरब लीटर एथनॉल की आपूर्ति का करार किया गया है जिसमें गन्ना अवयवों से निर्मित एथनॉल भी शामिल है। कुल अनुबंधित मात्रा के लगभग 85 प्रतिशत एथनॉल की आपूर्ति की जा चुकी है जबकि शेष 15 प्रतिशत भाग की आपूर्ति सितम्बर एवं अक्टूबर के दो महीनों में की जाएगी।&nbsp;</span></p><p>अनाज से निर्मित एथनॉल में मक्का का योगदान सबसे ज्यादा देखा जा रहा है। मक्का से निर्मित करीब 3.45 अरब लीटर एथनॉल की आपूर्ति हुई। इसके बाद भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अधिशेष चावल से निर्मित 2.14 अरब लीटर तथा क्षतिग्रस्त खाद्यान्न से निर्मित 64 करोड़ लीटर एथनॉल की आपूर्ति की गई। उल्लेखनीय है कि चालू मार्केटिंग सीजन के लिए कुल 7.60 अरब लीटर एथनॉल की आपूर्ति अनाज आधारित डिस्टीलर्स को करनी है जिसमें से 6.24 अरब लीटर की सप्लाई हो चुकी है।&nbsp;</p><p>जहां तक गन्ना अवयवों से निर्मित एथनॉल की बात है तो इसकी कुल आपूर्ति 2.71 अरब&nbsp; लीटर की हुई है जबकि इसके लिए कुल 2.89 अरब लीटर का कोटा आवंटित हुआ था। इसके तहत गन्ना जूस से निर्मित 1.49 अरब लीटर, बी-हैवी शीरा से निर्मित 1.07 अरब लीटर और सी-हैवी शीरा से उत्पादित 15 करोड़ लीटर एथनॉल की आपूर्ति शामिल थी। अगले मार्केटिंग सीजन में गन्ना अवयवों से निर्मित एथनॉल की आपूर्ति के कोटे में कुछ कटौती होने की संभावना है क्योंकि सरकार चीनी का उत्पादन बढ़ाना चाहती है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37497</guid>				
                <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 16:07:48 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[मोटे अनाजों का रकबा गत वर्ष के निकट पहुंचा]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। मक्का के बिजाई क्षेत्र में करीब 2.50 लाख हेक्टेयर की भारी गिरावट आने के बावजूद इस वर्ष खरीफ कालीन मोटे अनाजों का कुल उत्पादन क्षेत्र सुधरकर 183.17 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है जो पिछले साल के क्षेत्रफल 182.48 लाख हेक्टेयर से 69 हजार हेक्टेयर ज्यादा है। इसका कारण खासकर ज्वार के रकबे में 1.10 लाख हेक्टेयर तथा बाजरा के बिजाई क्षेत्र में 2.01 लाख हेक्टेयर का इजाफा होना है।</span></p><p>केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के नवीनतम साप्ताहिक आंकड़ों के अनुसार पिछले साल के मुकाबले चालू खरीफ सीजन के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर ज्वार का रकबा 12.61 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 13.71 लाख हेक्टेयर तथा बाजरा का बिजाई क्षेत्र 62.89 लाख हेक्टेयर से उछलकर 64.88 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया जबकि दूसरी ओर मक्का का उत्पादन क्षेत्र 94.08 लाख हेक्टेयर से लुढ़ककर 91.59 लाख हेक्टेयर तथा रागी का रकबा 8.77 लाख हेक्टेयर से फिसलकर 8.67 लाख हेक्टेयर रह गया। </p><p>पहले रागी की बिजाई काफी पिछड़ रही थी। खरीफ सीजन के अन्य मोटे अनाजों (स्मॉल मिलेट्स) का क्षेत्रफल 4.15 लाख हेक्टेयर सुधरकर 4.31 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया। मोटे अनाजों की बिजाई लगभग समाप्त हो चुकी है।</p><p>मक्का के बिजाई क्षेत्र में गिरावट का अनुमान पहले से ही लगाया जा रहा था क्योंकि इसका बाजार भाव तथा केन्द्र सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) किसानों के लिए आकर्षक नहीं था। हालांकि बाजार का दाम भी एमएसपी से कुछ नीचे ही था लेकिन फिर भी इसकी खेती में किसानों ने अच्छी दिलचस्पी दिखाई।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37495</guid>				
                <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 15:38:53 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[उड़द की बदौलत दलहनों के क्षेत्रफल में अच्छी बढ़ोत्तरी]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। लम्बे समय तक पिछड़ने के बाद खरीफ कालीन दलहन फसलों का उत्पादन क्षेत्र गत वर्ष से आगे निकल गया है जो एक शुभ संकेत है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष 11 सितम्बर तक दलहन फसलों का कुल उत्पादन क्षेत्र बढ़कर 118.46 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया जो पिछले साल की समान अवधि के बिजाई क्षेत्र 116.79 लाख हेक्टेयर से 1.67 लाख हेक्टेयर अधिक है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">समीक्षाधीन अवधि के दौरान अरहर (तुवर) का उत्पादन क्षेत्र 45.47 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 46.11 लाख हेक्टेयर, उड़द का बिजाई क्षेत्र 22.81 लाख हेक्टेयर से उछलकर 25.52 लाख हेक्टेयर तथा मोठ का रकबा 9.20 लाख हेक्टेयर से सुधरकर 9.24 लाख हेक्टेयर पर पहुंचा जबकि मूंग का क्षेत्रफल 34.49 लाख हेक्टेयर से घटकर 33.30 लाख हेक्टेयर और अन्य दलहनों का बिजाई क्षेत्र 4.27 लाख हेक्टेयर से गिरकर 3.83 लाख हेक्टेयर रह गया।&nbsp;</span></p><p>खरीफ कालीन दलहन फसलों की बिजाई बिल्कुल अंतिम चरण में पहुंच गई है। मानसूनी वर्षा के असमान वितरण से फसलों की हालत कहीं उत्साहवर्द्धक तो कहीं निराशाजनक देखी जा रही है। तुवर के दोनों शीर्ष उत्पादक राज्यों- महाराष्ट्र एवं कर्नाटक में इस बार पर्याप्त बारिश नहीं हुई है। </p><p>अब सबका ध्यान सितम्बर की वर्षा पर टिका हुआ है। उड़द, मूंग एवं मोठ जैसी कम अवधि की दलहन फसलों के नए माल की आवक अगले महीने से बढ़ जाएगी मगर तुवर एक लम्बी अवधि वाली दलहन फसल है इसलिए इसके नए माल की आपूर्ति की रफ्तार दिसम्बर-जनवरी में ही जोर पकड़ सकेगी।&nbsp;</p><p>बिजाई क्षेत्र में वृद्धि के बावजूद दलहन फसलों का उत्पादन बढ़ने में तब तक संदेह रहेगा जब तक मौसम एवं वर्षा की हालत अनुकूल नहीं हो जाती। सितम्बर में अच्छी बारिश की जरूरत है। महाराष्ट्र-गुजरात में वर्षा हुई है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37493</guid>				
                <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 15:09:31 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[कपास का रकबा गत वर्ष से एक लाख हेक्टेयर पीछे]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में बिजाई में इस नियमित सुधार के कारण राष्ट्रीय स्तर पर कपास का उत्पादन क्षेत्र अब 109.34 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है जो पिछले साल की समान अवधि के बिजाई क्षेत्र 110.31 लाख हेक्टेयर से 97 हजार हेक्टेयर कम है। पहले पंजाब, हरियाणा, एवं राजस्थान जैसे प्रांतों में बिजाई घटने से कपास के कुल रकबे में भारी गिरावट आ गई थी। उस समय गुजरात और महाराष्ट्र जैसे शीर्ष उत्पादक राज्यों में भी क्षेत्रफल काफी पीछे चल रहा था।&nbsp;</span></p><p>दक्षिण भारत में बारिश कम होने से कपास की फसल पर खतरा बना हुआ है जबकि अन्य उत्पादक राज्यों में फसल की स्थिति काफी हद तक संतोषजनक देखी जा रही है। मध्य प्रदेश में अच्छी बारिश हुई है। महाराष्ट्र के नासिक डिवीजन में कम तथा अनियमित वर्षा के कारण न केवल कपास की बिजाई घटी है बल्कि फसल भी उत्साहवर्धक हालत में नहीं है।</p><p>कुछ राज्यों में कपास की अगैती बिजाई वाली फसल की तुड़ाई-तैयारी आरंभ हो गई है जबकि अगले महीने से सभी उत्पादक प्रांतों में इसकी रफ्तार बढ़ने की उम्मीद है। 31 अक्टूबर 2026 तक रूई का आयात शुल्क मुक्त रहेगा।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37490</guid>				
                <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 13:39:34 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज स्थापित होने की संभावना बढ़ी]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। संसार में चावल, गेहूं, मक्का एवं सोयाबीन का सर्वाधिक उत्पादन ब्रिक्स के सदस्य देशों- ब्राजील, रूस, भारत, चीन एवं दक्षिण अफ्रीका में होता है। चीन, भारत और रूस गेहूं के, चीन और भारत चावल के, ब्राजील सोयाबीन के तथा चीन, ब्राजील एवं भारत मक्का के सबसे प्रमुख उत्पादक देश है। </span></p><p><span style="font-size: 1rem;">इसके अलावा इन देशों में दलहनों का उत्पादन भी सबसे ज्यादा होता है। इसे देखते हुए इन देशों में एक साझा ग्रेन एक्सचेंज की स्थापना की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। 12-13 सितम्बर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 18 वें ब्रिक्स सम्मेलन में इस आशय के एक प्रस्ताव पर सदस्य देशों में सहमति बन गई।&nbsp;</span></p><p>दिलचस्प तथ्य यह है कि रूस चाहता है कि यह ग्रेन एक्सचेंज पायलट आधार पर इसी वर्ष आरंभ हो जाए और अगले वर्ष (2027) से यह पूर्वं व्यवस्थित रूप से कार्य करने लगे। नई दिल्ली घोषणा पत्र में कहा गया है कि इस एक्सचेंज की कार्य प्रणाली तथा उसके तौर-तरीकों पर और अधिक विचार विमर्श किया जाएगा। </p><p>घोषणा पत्र में आगे कहा गया है कि ब्रिक्स के सदस्य देशों ने वैश्विक खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा खाद्य उत्पादों की कीमतों में आने वाले भारी उतार-चढ़ाव के प्रभाव को कम करने की जरूरत पर जोर दिया है। इसके साथ-साथ तमाम खाद्य उत्पादों एवं उर्वरकों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया है।</p><p> इस सम्बन्ध में ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच एक ग्रेन ट्रेडिंग प्लेटफार्म स्थापित करने का प्रयास आरंभ करने पर आम सहमति बन गई है। इसकी पूरी रुपरेखा तैयार करने के लिए आगे होने वाली बातचीत का स्वागत है। समय के साथ-साथ इस एक्सचेंज में अन्य कृषि उत्पादों एवं उर्वरकों को भी शामिल किया जाएगा।&nbsp;</p><p>यदि ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज अस्तित्व में आता है तो यह अमरीका के शिकागों मर्केंटाइल एक्सचेंज (सीएमई) का एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। रूस का कहना है कि ब्रिक्स ग्रेन एक्सचेंज में कारोबार आरंभ होने पर सदस्य देशों को सालाना 2.50 अरब डॉलर की बचत हो सकती है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37488</guid>				
                <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 12:57:55 +0530</pubDate>
            </item>
                    <item>
                <title><![CDATA[चीनी बाजार पर सबका ध्यान केन्द्रित]]></title>
                <link><![CDATA[https://test.igrainindia.com/posts/-]]></link>                
                <description><![CDATA[<p><span style="font-size: 1rem;">नई दिल्ली। अक्टूबर 2026 से औपचारिक तौर पर आरंभ होकर सितम्बर 2027 तक जारी रहने वाले नए मार्केटिंग सीजन के दौरान चीन के वास्तविक उत्पादन एवं बाजार भाव का अनुमान लगाना अभी कठिन है क्योंकि एक तो मौसम एवं मानसून की स्थिति में अनिश्चितता देखी जा रही है और दूसरे, एथनॉल के निर्माण में गन्ना जूस तथा बी हैवी शीरा के उपयोग के सम्बन्ध में सरकार का निर्णय भी अभी तक सामने नहीं आया है।&nbsp;</span></p><p>चीनी उद्योग के लिए 2025-26 का मार्केटिंग सीजन खट्टे मीठे अनुभवों का रहा। शुरुआती दौर में चीनी का घरेलू बाजार भाव नरम रहने से उद्योग को कठिनाई हुई मगर जुलाई-अगस्त में दाम उछलकर नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने से मिलर्स को कुछ राहत मिली। सितम्बर में चीनी का एक्स फैक्टरी मूल्य घटकर पुनः सामान्य स्तर के आसपास आ गया।</p><p>चीनी उद्योग के समक्ष अगले मार्केटिंग सीजन में कई चुनौतियां मौजूद रहेंगी। अल नीनो की तीव्रता एवं ताकत बढ़ती जा रही है। सितम्बर में वर्षा कम होने की संभावना है। उद्योग के पास चीनी का स्टॉक घटकर हाल के वर्षों के न्यूनतम स्तर पर सिमटने की संभावना है। </p><p>चीनी के निर्यात पर प्रतिबंध लगा हुआ है और एथनॉल निर्माण में गन्ना जूस के इस्तेमाल पर नियंत्रण लागू होने का अंदेशा है। देश भर की 540 चीनी मिलों के साथ-साथ 5 करोड़ गन्ना उत्पादक किसानों के लिए भी 2026-27 सीजन का परिदृश्य अभी अनिश्चित बना हुआ है जबकि चीनी बाजार पर सरकार की गहरी नजर है।</p>]]></description>
                <author><![CDATA[rahul.chauhan@bhartiagri.in (Rahul Chauhan)]]></author>  
				<guid>https://igrain.in/feed/37486</guid>				
                <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 12:05:12 +0530</pubDate>
            </item>
                
    </channel>

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